Top 20 Gulzar Shayari in Hindi 2019 {100% Unique & Fresh}



Gulzar Shayari in Hindi 2019 - Gulzar sir has given us some of the best and beautiful Shayari in the world. He is a pretty much famous filmmaker and writer. I hope you liked it and enjoy the same.

Gulzar Shayari in Hindi 2019

Gulzar Shayari in Hindi 2019


1.
आदतन तुम ने कर दिए वादे,
आदतन हम ने ऐतबार किया,
तेरी राहो में बारहा रुक कर,
हम ने अपना ही इंतज़ार किया,
अब ना मांगेंगे जिंदगी या रब,
ये गुनाह हम ने एक बार किया.

2.
बहुत मुश्किल से करता हूँ,
तेरी यादों का कारोबार,
मुनाफा कम है,
पर गुज़ारा हो ही जाता है.

3.
शायर बनना बहुत आसान है,
बस एक अधूरी मोहब्बत की मुकम्मल डिग्री चाहिए.

4.
पलक से पानी गिरा है,
तो उसको गिरने दो,
कोई पुरानी तमन्ना,
पिंघल रही होगी.

5.
कोई पुछ रहा हे मुजसे मेरी जीन्दगी की कीमंत,
मुझे याद आ रहा है तेरा हल्के से मुस्कुराना.

6.
ऐ हवा उनको कर दे खबर मेरी मौत की... और कहेना,
के कफ़न की ख्वाहिश में मेरी लाश,
उनके आँचल का इंतज़ार करती है.

7.
सुनो...
जब कभी देख लुं तुम को,
तो मुझे महसूस होता है कि,
दुनिया खूबसूरत है.

8.
बहोत अंदर तक जला देती है,
वो शिकायतें जो बयाँ नही होती.

9.
एक सपने के टूटकर चकनाचूर हो जाने के बाद,
दूसरा सपना देखने के हौसले को 'ज़िंदगी' कहते हैं.

10.
बेबस निगाहों में है तबाही का मंज़र,
और टपकते अश्क की हर बूंद,
वफ़ा का इज़हार करती है,
डूबा है दिल में बेवफाई का खंजर,
लम्हा-ए-बेकसी में तसावुर की दुनिया,
मौत का दीदार करती है,
ऐ हवा उनको कर दे खबर मेरी मौत की... और कहेना,
के कफ़न की ख्वाहिश में मेरी लाश,
उनके आँचल का इंतज़ार करती है.

11.
तेरी यादों के जो आखिरी थे निशान,
दिल तड़पता रहा, हम मिटाते रहे,
ख़त लिखे थे जो तुमने कभी प्यार में,
उसको पढते रहे और जलाते रहे.

12.
मचल के जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू ,
सुना है आबशारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|


खुदारा अब तो बुझ जाने दो इस जलती हुई लौ को ,
चरागों से मज़ारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|

कहू क्या वो बड़ी मासूमियत से पूछ बैठे है ,
क्या सचमुच दिल के मारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|


तुम्हारा क्या तुम्हें तो राह दे देते हैं काँटे भी ,
मगर हम खांकसारों को बड़ी तकलीफ़ होती है|

13.
चौदहवीं रात के इस चाँद तले,
सुरमई रात में साहिल के क़रीब,
दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू,
ईसा के हाथ से गिर जाए सलीब,
बुद्ध का ध्यान चटख जाए,
कसम से तुझ को बर्दाश्त न कर पाए खुदा भी,
दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू,
चौदहवीं रात के इस चाँद तले.

14.
सितारे लटके हुए हैं तागों से आस्माँ पर,
चमकती चिंगारियाँ-सी चकरा रहीं आँखों की पुतलियों में,
नज़र पे चिपके हुए हैं कुछ चिकने-चिकने से रोशनी के धब्बे,
जो पलकें मूँदूँ तो चुभने लगती हैं रोशनी की सफ़ेद किरचें,
मुझे मेरे मखमली अँधेरों की गोद में डाल दो उठाकर,
चटकती आँखों पे घुप्प अँधेरों के फाए रख दो,
यह रोशनी का उबलता लावा न अन्धा कर दे.

15.
बस एक चुप सी लगी है, नहीं उदास नहीं,
कहीं पे सांस रुकी है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है,
कोई अनोखी नहीं, ऐसी ज़िन्दगी लेकिन,
खूब न हो, मिली जो खूब मिली है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है,
सहर भी ये रात भी, दोपहर भी मिली लेकिन,
हमीने शाम चुनी, हमीने शाम चुनी है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है,
वो दासतां जो, हमने कही भी, हमने लिखी,
आज वो खुद से सुनी है,
नहीं उदास नहीं, बस एक चुप सी लगी है.

16.
देखो,
आहिस्ता चलो,
और भी आहिस्ता ज़रा देखना,
सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा.

17.
रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है,
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं,
कांच का नीला सा गुम्बद है,
उड़ा जाता है,
ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है,
चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशम भी नहीं,
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती है,
और सन्नाटों की इक धूल सी उड़ी जाती है,
काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी,
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है.

18.
खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।
डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
"कोई वादा नहीं... लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"
या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?"
सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?
कह रहा हो शायद वो...
"धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!"
सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं
"इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!"
उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो... या
उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि, लाजवाब हूँ मैं!खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।
डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
"कोई वादा नहीं... लेकिन
देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"
या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैं
अब तुम्हें देने को बचा क्या है?"
सामने रख के देखते हो जब
सर पे लहराता शाख का साया
हाथ हिलाता है जाने क्यों?
कह रहा हो शायद वो...
"धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!"
सामने रौशनी के रख के देखो तो
सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं
"इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!"
उसने भी वक्त के हवाले से
उसमें कोई इशारा रखा हो... या
उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
सिर्फ इतना कहा कि, लाजवाब हूँ मैं!

19.
ना दूर रहने से रिश्ते टूट जाते हैं,
ना पास रहने से जुड़ जाते हैं,
यह तो एहसास के पक्के धागे हैं,
जो याद करने से और मजबूत हो जाते हैं.

20.
मैं चुप कराता हूं हर शब उमड़ती बारिश को,
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है.

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